देह का सत्कार
कितने विपदा,आहत समय पश्चात
चला मैं घर से बाहर तन के तात
बेहद सुहावनी, जीवन का यह डर है
डर से भला डरा कौन, पर क्या कदर है
इम्तिहान दिया, पाई जय अति जीवन में
पर दृष्टि न सुनी सृष्टि, बाहर न अपने घर में
समय मिला, थोड़ा सा नम इस मन की
दीन हूं, साहस है व्याधि नई कम न इस तन की
सफर है, मुसीबत नहीं काल पर दी दिया
चलते चलते पहुंच गए अपने साज की जिया
पथ पर आगे बढ़ ज्ञान आगे किस प्रकार
जैसे अज्ञानता नहीं किया देह का सत्कार
पल प्रवीण बन जन तन मांग भोर हुआ
कामना रहित मोह का क्षण उद्भव हुआ
फिर निकल पड़ा विरला तैयारी की वापसी
पर्दा स्वयं खुल टिका ज्यो मेल सह वापसी
कुछ लोग भूल गए, प्रेम की वासडिह
धन की कैसी, के लिए, नपुंसकता की त्रासदी
धन के लिए तन से मस्त है, पर नपुंसक कौन हैं अबला के लिए महाभारत हुआ, पर जमीं अब भी मौन है
क्यों स्वयं के लिए, कारण है, कारण्य नहीं
धरती पर जन्मा श्रम,कर्म सही,पर धर्म नहीं
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