मांझी
कैसा वो रिश्ता था
सस्ता होकर महंगा था
सस्ता होकर महंगा था
प्रेम गई सब छूट गया
सुख ने मुख मोड़ लिया
ओस की आंधी जीवन में
दर्पण ढलती अर्पण में
वक्त ने कैसा साथ निभाया
सन्नाटा कभी बताकर नहीं आया
दर्द इतना कि ढल गया बहार में
दम नहीं रोकने की चेतना पहाड़ में
धैर्य था उनका कितना बड़ा
अतुल्य स्मित का जितना प्रयास खड़ा
प्रेम है वो कितना महान
राधा-कृष्ण जो फीके पकवान
कितनी बार वे टूटे होंगे
विश्वास है फिर भी उम्मीद जोगे
एक बार में न टूटे पाशान
दृढ़ दृढ़ सी कौन है ये इंसान महान
जब टूटो तुम अपने मार्ग में
याद करना मांझी को साथ में
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