सोचा नहीं था

सोचा नही था
एक दिन होगा ऐसा
भ्रम या झूठा जैसा
सही वक्त पर रूठना कैसा


सख्त की पाबंदी नहीं किसी को
दिन रात तात पर लात जो
रक्त से ही क्यो है मिलन वो
संभलना तो फिर दूरी कैसा

जानता हूं
एक दिन चले जाएंगे सब
पर क्यो, कैसे और कब
न मगर अन्त पर भूलना कैसा

दिया जले हैं, अंधविश्वास पर
अंजुम वह रात बात कर
बिगड़ जाएगी सच की प्रात जड़
परिवर्तन सही फिर भागना कैसा

भेंट दी उस भोड़ की
उमंग अटकती भाव भी
कोश स्वर की उदघोष सी
पकड़ नहीं पर छोड़ना कैसा

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